कार्यपालिका – न्यायपालिका संबंध

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स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही भारत ने अपनी राहे स्वयं ही निर्मित करनी प्रारम्भ कर दी अगर शैशव काल से देखा जाये तो यह पाया जाता है कि एक राष्ट्र के रुप में भारत कभी भी बनी बनाई पद्धति पर अग्रसर नहीं हुआ। समय-समय पर भारत ने अपनी राह स्वयं ही विकसित की।

स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद से ही राजनीति के स्वरुप व कार्यप्रणाली में समयानुकूल परिवर्तन प्रारम्भ हो गये। इन्हीं परिवर्तनों, आशाओं, अकाशों में वादों और विरोधों के बावजूद नवीन प्रवृत्तियां के कारण सदैव जीवन्त रहा।

पिछले दशकों में जबकि भारत में लोकतन्त्र की स्थापना हुई तब सर्वोच्च सदनों, संसद एवं विधायिका के स्वरुपों एवं कार्यप्रणाली में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुये। उस दौर की एक अन्य प्रवृत्ति में विधायिका बनाम न्यायपालिका एक बड़ा मुद्दा रहा है। चूंकि भारत द्वारा संसदीय कार्य प्रणाली को अपनाया गया जिसके अन्तर्गत संविधान की सर्वोच्चता को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया। साथ ही लोकतन्त्र/प्रजातन्त्र की भावना अनुरूप शक्ति पृथक करण के सिद्धान्त को भी यथा संभव लागू किया गया तथा यह अपेक्षा की गई कि सरकार के तीनों अंग, व्यवस्थापिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका अपने-अपने क्षेत्रों में बिना किसी हस्तक्षेप के निष्पक्ष रूप से अपने-अपने कार्यकलापों को कर सके।

हालांकि विधायिका एवं न्यायपालिका से विधायन के प्रश्न पर विभिन्न अवसरों पर मतभेद हो यह स्वाभिक है और ऐसा हुआ भी परन्तु मतभेदों के उपरान्त भी शाक्ति पृथक करण की स्थिति अपने चरम पर नहीं गई। पिछले वर्षों में अनेक ऐसे विषय उभरे जिसमें निरन्तर न्यायपालिका एवं विधायिका में मतभेद रहा। जिनमें मुख्य रूप से लोक प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन समान नागरिकता संहिता पर मतभेद का फिर आरक्षण के मामले में से या बिहार, झारखण्ड के चुनाव एवं सरकार समस्या पर दोनों ही संस्थाऐं आमने सामने रही।

विधायिका एवं न्यायपालिका के मध्य प्रथम शक्ति परीक्षण की पृष्ठभूमि संविधान के प्रथम संशोधन के समय से बनने लगी थी। प्रथम संशोधन द्वारा निम्नांकित परिवर्तन किये गये थे।

  • भूमि सुधार सम्बन्धी कानून बनाये गये और संविधान में एक नई 9वीं अनुसूची जोड़ी गई।
  • 19(2) में भाषण व अभिव्यक्ति की स्वतंत्र के प्रतिबन्ध लगाने के लिये तीन नये आधार
  •  लोक व्यवस्था, 
  • विदेशी राज्यों से मैत्रीय सम्बन्ध 
  • अपराध करने के लिये उत्प्रेरित करना जोड़े गये। इसके अलावा व्यापार व कारोबार के राष्ट्रीयकरण की शक्ति केन्द्र को देना, भूमि सम्बन्धी सुधार के कानून को प्रभावी बनाने के लिये अनुच्छेद 31 के ‘क‘ ‘ख‘ खण्ड जोड़े गये शैक्षणिक व सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग को सरकारी शिक्षण संस्थाओं के आरक्षण देने के लिये अनुच्छेद 15(4) जोड़ा गया। के बाद प्रथम टकराव की स्थिति गोलकनाथ वाद में सामने आई लेकिन संसद की संविधान संशोधन की शक्ति के मुद्दे पर 1973 में केशवानन्द भारतीवाद में संविधान के आधारभूत ढांचे को छोड़कर संसद की संशोधन शक्ति की मान्यता के वाद एवं महत्वपूर्ण विषय जनवरी 2007 में उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि इस अनुसूची में 24 अप्रेल 1973 के वाद शामिल किये गये कानूनों की समीक्षा की जा सकती है। अर्थात इन अनुसूची के सम्पत्ति अधिग्रहण की विधियों का वर्णन है।

इसी प्रकार विधायिका एवं न्यायपालिका में मध्य मतभेद का एक अन्य प्रकरण लोक सभा के सांसदों के निष्कासन के प्रश्न पर भी उभरा यह उल्लेखनीय है कि एक स्टिंग आपरेशन के दौरान 11 सांसदों को संसद में प्रश्न पूछने के एवज में रिश्वत लेते हुये कैमरे की मदद से पकड़े जाने पर छिपे कैमरे की मदद से पकड़े जाने पर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा पवन कुमार बंसल के प्रतिवेदन के अनुरूप उन्हें सदन से निष्कासित किया गया तो 16 फरवरी 2007 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लोकसभा से निष्कासित सांसदों के प्रकरण में सुनवाई करते हुये लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी, केबिनेट सचिव, और चुनाव आयोग का संवशिर करते हुये अनुच्छेद 105 सांसदों के विशेषाधिकार के अन्तर्गत नोटिस का जवाब न देते हुये इसे सम्मान वापिस भेजने का लोकसभाध्यक्ष द्वारा निर्णय किया गया। तर्क यह दिया गया कि संविधान में संसदीय कार्यवाही को न्यायालय के हस्तक्षेप से बाहर मानना।

न्यायपालिका एवं विधायिका के मध्य विवाद भारतीय राजनीति में नवीन परिवर्तन है। इसके तहत माना गया कि न्यायपालिका द्वारा राज्य के विधायी एवं कार्यकारी शाखाओं द्वारा आरक्षित क्षेत्रों में अतिक्रमण हो रहा है और ऐसा होना संसद की गरिमा के प्रतिकूल है।

इस प्रकार उपरोक्त तथ्यों के विवरण से ज्ञात होता है कि विधायिका व न्यायपालिकाओं का स्वतंत्र अस्तित्व होते हुये भी इनमें अकसर टकराव की स्थिति रहती है। हालांकि अभी तक यह चरम की स्थिति में नहीं पहुँची है।

वर्तमान में, एससी/एसटी एक्ट के मामले में विधायिका द्वारा यह तय किया गया कि संसद के सत्र में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार) कानून के संशोधन का विधेयक लायेगी। जबकि कोर्ट ने इस मामले में जाँच के बाद ही आरोपी की गिरफ्तार करने के आदेश दिये थे। यह स्थिति की टकराव की स्थिति इंगित करती है।

इसी प्रकार आधार से संबंधित विषय पर भी विधायिका व न्यायपालिका में टकराव की स्थिति सामने आती है। जहां सरकार इसकी अनिवार्यता रखना चाहती है। वहीं सर्वोच्च न्यायालय ने 26 सितम्बर 2018 में आधार मामले में संवैधानिकता वैधता को बरकरार रखा था लेकिन एस.सी. ने कई मामलों में आधार भी अनिवार्यता को खत्म कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय के कहा कि बैंक खातों को आधार से जोड़ना अनिवार्य नहीं होगा। ना ही मोबाइल कनेक्शनों के लिये आधार अनिवार्य होगा एवं स्कूलों में दाखिले के लिये की अनिवार्य नहीं होना। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने 4 बनाम 1 के बहुमत के फैसले में कहा था कि इन्कम टैक्स रिटर्न दाखिले के लिये एवं पैन (च्।छ) के लिये यह अनिवार्य रहेगा।

साथ ही अपने महत्वपूर्ण फैसले के तहत आधार एक्ट की धारा 57 को खारिज कर दिया जिसके तहत निजी कम्पनियों को बायो मैट्रिक डाटा लेने की इजाजत दी गई थी।

डाॅ. आशु सिन्हा

(एम.ए., पीएच.डी.), असिस्टेंट प्रोफेसर

खण्डेलवाल वैश्य गर्ल्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी

जयपुर।

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