पहले भीड़ संभालना सीखें नीतीश कुमार, फिर करें भीड़ जुटाने की राजनीति!

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नीतीश कुमार पहले भीड़ को संभालना सीख लें, फिर भीड़ जुटाने की राजनीति करें। जब उन्होंने बिहार में चप्पे-चप्पे पर शराब की दुकानें खुलवाई थीं, तब इसके विरोध में बनने वाली हर मानव-शृंखला को अपनी पुलिस के द्वारा वे तहस-नहस करवा दिया करते थे। राज्य के गुंडे भी कलेक्ट्रेट के सामने शराब-विरोधियों की पिटाई कर देते थे, लेकिन प्रशासन धृतराष्ट्र बना रहता था। अब नीतीश जी स्वयं शराब के विरोध में मानव-शृंखला बनवा रहे हैं। बड़ी अच्छी बात है।

जो रोज़-रोज़ बदले नहीं, वह नीतीश कुमार क्या? जो एक दिन भाजपा के साथ, दूसरे दिन कांग्रेस के साथ, तीसरे दिन लालू के साथ न चला जाए, वह नीतीश कुमार क्या? जो एक दिन फारबिसगंज में गोली चलवा दे और दूसरे दिन सेक्युलर न बन जाए, वह नीतीश कुमार क्या? जो एक दिन भरे भोज से लोगों को भगा दे और दूसरे दिन दूसरों के भोज में भी उसे न बुला ले, तो वह नीतीश कुमार क्या? जो एक दिन शराब की दुकानें खुलवाए और दूसरे दिन उन्हें बंद न करवा दे, तो वह नीतीश कुमार क्या? जो एक दिन मानव-शृंखला पर लाठियां चलवाए, दूसरे दिन मानव-शृंखला न बनवा दे, तो वह नीतीश कुमार क्या?

नीतीश कुमार परिवर्तन का ही तो नाम है। पहले टर्म में नीतीश जी ने सड़कें और साइकिलें दिखाकर चुनाव में जीत हासिल की। दूसरे टर्म में आरक्षण और कथित जंगलराज की ताकत से चुनाव जीता। तीसरे टर्म में वे शराब-बंदी के सहारे चुनाव जीतने की योजना बना चुके हैं। इस एक काम से वह बिहार में बहार ले आएंगे। अपराधियों, बाहुबली विधायकों और विधायक-पुत्रों को इस बहार में नौका-विहार करने की खुली छूट होगी। जनता की नावें डूब जाया करेंगी, पर उनकी नावें लहरों से अठखेलियां करती रहेंगी।

जय नीतीश जय नीतीश जय नीतीश नेता।
कलयुग में ले आए सतयुग और त्रेता।
बिहार में बहार है।
क्योंकि नीतीशे कुमार है।

  • अभिरंजन कुमार , लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार है
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